
दुनिया बदल रही है
शायद उसके आकार में हम भी !
पर क्या यह बदलाव अच्छा है ?
ना जाने कितना ही सच्चा है ।
बदलते बदलाव को अपनाना उतना ही मुश्किल है
जितना अपने आप को बदलाव के लिए मनाना ।
जो पहले हुआ वो शायद ही अब होगा ।
या फिर जो पहले कभी ना हुआ वही अब होगा ?
ऐसे दोतर्फ़े हालत में क्या हम सच में बदलाव के लिए तयार है ?
या फिर यह कोई चुनौती है —
जो ना मौक़ा देगी ना दस्तूर ।
⁃ – बस्स छा जाएगी अंधकार की तरह
⁃ – रोशिनी की उम्मीद को खोजने के रास्ते में
⁃ – अयने के सामने खुद को पाने के डर में
फिर ना लौट पाएँगे हम अपनी गली ।
बदलाव को अपनाना भले ही मुश्किल लगे
पर उस कोशिश की दाद देनी होगी जो सामना कर पाया ।
आदतें आसानी से बदलते नहीं
पर शायद इसीलिए इन आदतों को बदलने की कोशिश की जाती है ।
इन आदतों के साथ हर नया मोड़ कुछ नयी आदतें अपनाती है –
और वही कुछ पुरानी पीछे रह जाती है ।
यह सिलसिला किसी भूलभूलाइए से कम नहीं है –
जो जहाँ से प्रारंभ होता है शायद वो वही पे आके खतम भी होता है ।
लोग कहते है , दुनिया गोल है –
तो कभी ना कभी फिरसे उसी गली पोहोच ही जाओगे !
तो पहले पन्ने पे उन गलियों से मुड़ना ही क्यू ?
. . . . . जिनपे फिरसे कदम रखने की उम्मीद हो
ऐसे पन्नो से छूटना ही क्यू ?
. . . . . जिनसे फिरसे जुड़ने की तमन्ना हो
ऐसे चुनौतियों से भागना ही क्यू ?
. . . . . . जिनसे फिरसे लढ़ने की आशंका हो
ऐसे दर्द से छिपना ही क्यू ?
. . . . . . जिसके अंधेरे से फिरसे सामना करना ही हो
ऐसे बदलाव से घबराना ही क्यू ?
. . . . . जिससे कभी ना कभी रूबरू होना ही हो
क्या इन सब के बाद भी डरना ज़रूरी है ?
मेरी मानो तो –
डर से जीतना होगा
फिर से उठकर लढना होगा
फिर से अपने आप को खोजना होगा
फिर से उसी जगह शुरुआत करनी होगी
फिर से चुनौतियाँ जीतनी होगी
फिर से डटकर बदलाव के लिए तयार होना होगा
फिर से नए बदलाव अपनाने होंगे
फिर से अपने आप से सवाल करने होंगे की —
क्या दुनिया बदल रही है ?
या फिर क्या उसके आकार में हम ?
दुनियां बदल रही है 👌👌👌
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जबरजस्त
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