Word TRAP !

जब भी लिखना चाहा है,
तभी याद आया है ,
शब्दों के जाल में कहीं खुद को पाया है||

मौसम बदलते रहे,
दिन ढलते रहे,
पर शब्दों का ये सिलसिला वहीं खड़ा पाया है ||

ना धूप में ना छाँव में ,
ना बारिश में ना बर्फ़ में ,
शब्दों ने कभी ना साथ छोड़ा है |
ज़िंदगी के हर सफ़र में ,
ख़ुशी में हो या ग़म में ,
हमेशा अपने आपको शब्दों में उलझा पाया है ||

कही किसी रोज़ किताब के किसी पन्ने पर अपनी कहानी लिखनी चाही है,
एक ऐसी कहानी जो मेरे शब्दों को सुलझा पाए |
एक ऐसी कहानी जो मेरे दिल से रूह तक पहुँच जाए |
एक ऐसी कहानी जो मेरे शब्दों के अस्तित्व का एहसास दिला जाए |
एक ऐसी कहानी जो बस कहानी न बनकर रह जाए ||

क्या कभी मेरे ये शब्द पत्थर पर उत्कीर्ण कर पाऊँगी ?
क्या कभी मैं अपने आपको इन्ही शब्दों में ढाल पाऊँगी ?
क्या मैं कभी इसी जाल को सुलझा पाऊँगी ?
या फिर इसी जाल में उलझकर रह जाऊँगी ?

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