जब भी लिखना चाहा है, तभी याद आया है , शब्दों के जाल में कहीं खुद को पाया है|| मौसम बदलते रहे, दिन ढलते रहे, पर शब्दों का ये सिलसिला वहीं खड़ा पाया है || ना धूप में ना छाँव में , ना बारिश में ना बर्फ़ में , शब्दों ने कभी ना साथ छोड़ा है | ज़िंदगी के हर सफ़र में , ख़ुशी में हो या ग़म में , हमेशा अपने आपको शब्दों में उलझा पाया है || कही किसी रोज़ किताब के किसी पन्ने पर अपनी कहानी लिखनी चाही है, एक ऐसी कहानी जो मेरे शब्दों को सुलझा पाए | एक ऐसी कहानी जो मेरे दिल से रूह तक पहुँच जाए | एक ऐसी कहानी जो मेरे शब्दों के अस्तित्व का एहसास दिला जाए | एक ऐसी कहानी जो बस कहानी न बनकर रह जाए || क्या कभी मेरे ये शब्द पत्थर पर उत्कीर्ण कर पाऊँगी ? क्या कभी मैं अपने आपको इन्ही शब्दों में ढाल पाऊँगी ? क्या मैं कभी इसी जाल को सुलझा पाऊँगी ? या फिर इसी जाल में उलझकर रह जाऊँगी ?
Nyc one..👌👍
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Simple yet deep.. nice work 👍
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Nice one 👍
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Nice one
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बहुत सुंदर रचना है
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