खामोशी

कैसी खामोशी है यें ?
जो कभी पहेली लगतीं है ,
तो कभी वास्तविकता |
यें तो बहिर्मुखी की उपास्तिथि भी महसूस ना होने देती ,
और अंतर्मुखी के अंतहकर्ण में भी पन्हा लेती |
जो दो लोगों की बातचीत भी चुरा लेती ,
तो उन्ही दो लोगों की लढ़ाई में जीत जाती ||

कैसी खामोशी है यें ?
जो यादोंकी बाढ़ ले आती है ,
और दूसरे ही पल उन्ही के साथ बेह जाती है |
जो भीड़ में भी ख़ालीपन का ऐहसास दिलाती है ,
और वही किसी ओर अकेलेपन मे ताक़त बन जाती है ||

कैसी खामोशी है यें ?
जो आज चारों ओर छायी हुईं है ,
पर उसका असर मानो क़ैद सा है |
जो हर चेहरे पर भले ही ना दिखती है ,
पर हर एक मन के आयने में प्रदर्शित है ||

कैसी खामोशी है यें ?
जो सूरज की किरनो में बस्ती है ,
तो चाँद की गेहराहीयों में ढलती है |
एक ओर ख़ुशियों की सौग़ात लाती है ,
तो वही दूसरी ओर दर्द में लिपटे ज़स्बात |
जो मासूमियत के साथ छुपी है ,
तो कई समझदारियों के साथ लढ़ी है |
जो हर भावना के साथ जुड़ी है ,
नाराज़गी के माफ़ी में ,
तो ग़ुस्से के आघोश में |
प्यार के लम्हे में ,
तो हिम्मत के बदले में ||

कैसी खामोशी है यें ?
जो हर रात के सन्नाटे में है ,
तो वही हर बारिश के बरसने में है |
जो हर दुआओं के वादों में है ,
तो हंसी के चहकने में भी है ||

कैसी खामोशी है यें ?
जो चार दीवारों में क़ैद है ,
और कही खुले भीड़ में छायी है |
जो दर्द की राहत बनी है ,
तो कही ख़ुशी कीं चाहत ||

कैसी खामोशी है यें ?
जो होके भी कही गुम है ,
और गुम होके भी हर पल में नम्म है ||

कैसी खामोशी है यें …?

3 thoughts on “खामोशी

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